Online Classes - Paramjit Kaur

reality of online classes


वह अपना बस्ता लेकर उचक- उचक कर उन कच्चे रास्तों के आगे बनी अपनी पाठशाला के दरवाज़े पर टकटकी लगाए देख रही थी ।

वह मुस्कुराकर बुदबुदाई – कितना अच्छा लगता था ,स्कूल जाना ! पता नहीं कब खुलेगा .....? अरी बिटिया ,कहाँ चली गई....? माँ की आवाज़ से वह बस्ता एक तरफ़ रख कर ,रसोई में जाकर, बेमन से, माँ की मदद करने लगी । पिता और भाई खाना खा रहे थे ।
पता नहीं ,इन बच्चों का स्कूल कब खुलेगा ? यह साल तो बर्बाद ही हो गया । माँ ,गहरी श्वास भर कर रोटी बनाने लगी ।

सुना है ,शहर में बच्चे आजकल मशीन पर पढ़ते हैं - पिता ने कहा । बाबा ! ...ऑनलाइन ....मेरे दोस्त ने बताया था । घर पर ही बैठ कर पढ़ लेते हैं। हाँ ,वही......यहाँ ,तो बिजली ,पानी का सही लाइन नहीं है....! करोना ने वैसे ही हाल ख़राब कर दिया है । घर में बेकार बैठने से तो अच्छा है न , खेत में मदद करो ।

पिता के हाथ धोते ही ,वह मचलकर उन के पास जाकर बोली -बाबा ,मुझे पढ़ना है। मुझे भी ऑनलाइन ला दो न , मेरी टीचर ने कहा था हमें खेतों में काम नहीं , पढ़ना चाहिए । हम भारत का भविष्य हैं !

भविष्य .....! महीनों से बंद पड़ी तेरी पाठशाला.....कोई देखने भी नहीं आया । इस देश का विकास तो हो रहा है मगर गाँवों के विकास में अ
भी समय है ।


ये गाँव की कच्ची सड़कें, शहरों तक नहीं जाती और न वहाँ की कागज़ पर लिखी बातें गाँवों तक पहुँच पाती हैं । बाबा ,भाई को खेत लेकर चले गए , और उसकी आँखें देर तक उन कच्चे रास्तों को देखती रहीं ।

  • विडंबना हैं ,कागज़ों पर लिखी विकास की बड़ी- बड़ी बातें ,गाँवों के टेढ़े- मेढ़े कच्चे रास्तों पर चलने से कतराती हैं। ऐसे में वर्चुअल क्लासेज़ की व्यवस्था की हकीकत भी सामने आती है ।

Paramjit Kaur